एक ऐसी दरगाह जहां मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए जाते हैं मटके

दिल्ली के मशहूर पुराना किला की  और जाते हुए प्रगति मैदान के नजदीक मटका पीर बाबा की दरगाह अक्सर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है | जहां दीवारों से लेकर पेड़ों पर भी सैकेंडों मटके नजर आते हैं | मटकों के पीछे की दिलचस्प कहानी 781 साल पुरानी इस दरगाह को लोगों के लिए और  भी ख़ास बना देती है |
सूफी संत हजरत शेख अबू बकर तूसी हैदरी कलन्दरी की दरगाह का नाम मटका पीर  दरगाह  में तबदील होने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है | कहानी के मुताबिक़ एक बार जब अबू बकर जमुना के किनारे टहल रहे थे तो अपनी बीमारयों से तंग हो चूका एक व्यक्ति ख़ुदकुशी के लिए दरिया में लगा | तभी अबू बकर ने उसे उसकी बीमारी दूर होने की दुआ करते हुए अपने मटके से पानी पिलाया और उस आदमी की सारी बीमारियां दूर हो गई तभी से सूफी संत अबू बकर मटका पीर बाबा के नाम से मशहूर हो गए |
आज भी पूरे देश से लोग मन्नत मांगने और सूफी संत अबू बकर की दरगाह के दर्शन करने यहां आते हैं |दरगाह के दर्शन करने में ना कोई मजहब आता है ना कोई दूरी| दिल्ली के  सुलतान गयासुदीन बलबन ने संत अबू  बकार को आजमाने के लिए लोहे के चन्ने और मिटटी की भेली थाल में सजा कर भेजी जो सूफी संत अबू बकर के हाथों में आकर खाने वाले चन्ने और गुड़, चना में तबदील हो गई |जिसे मटका पीर बाबा ने लोगों में बांटा तभी से लोग मन्नत पूरी होने पर मटका गुड़, चना, दूध और चादर दरगाह पर चढ़ाने लगे |
मटका पीर बाबा की दरगाह में गद्दी नशीनों में से एक शकील अहमद बताते है की मटका पीर बाबा की दरगाह एक सूफी संत की दरगाह है और हर सूफी इंसानियत की बात करता है | चाहे वह किसी भी धर्म या मजहब से जुड़ा हो यहां हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख इसाई,जैनी हर कोई आता है  |  इंसान समझा जाना चाहिए ना की धर्म के नाम पर भेदभाव किया जाना चाहिए  |
स्कीड अहमद का कहना है,” आज भी पूरा देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग मटका पीर की दरगाह पर आते हैं| लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर और महान संत की दरगाह पर आने वालों के लिए प्रशासन की ओर से किसी तरह के इंतजाम नहीं किए जाते | यहां ना उन्हें पार्किंग की सुविधा मिलती है और ना मेडिकल | यहां तक  की यहां आने वालों को सुविधाएं  दी जाएं

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