मेहंदीपुर बालाजी की यात्रा -Yatra & Information Hanumanji टेम्पल

यह एक ऐसा धाम है जहां दुष्ट आत्माओं से छुटकारा दिलाने में यह मंदिर सक्षम है यहाँ दिव्य शक्तियों के द्वारा व्यक्तियों का ईलाज किया जाता है ये यहाँ का बहुत ही शक्तिशाली मंदिर माना जाता है। यहां जिन लोगों के ऊपर बुरी शक्तियों का प्रभाव रहता है उन्हें जंजीर से aबांध दिया जाता है और उल्टा लटका दिया जाता है यह मंदिर और इससे जुड़े चमत्कार देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। शाम के समय जब बालाजी की आरती होती है तो भूतप्रेत से पीड़ित लोगों को यहाँ जूझते देखा जाता है
राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर नामक स्थान है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई- बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 -70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है दो पहाडिय़ों के बीच की घाटी में स्थित होने के कारण इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहा जाता है गीताप्रेस गोरखपुर द्वार प्रकाशित हनुमान अंक के अनुसार यह मंदिर लगभग 1 हजार साल पुराना है। यहां पर एक बहुत विशाल चट्टान में हनुमान जी की आकृति स्वयं ही उभर आई थी। इसे श्री हनुमान जी का स्वरूप ही माना जाता है। इनके चरणों में एक कुण्डी है जिसमें से कभी पानी कम नहीं होता |
जंजीर में बांधकर पीड़ित लाए जाते हैं
कहा जाता है कि कई साल पहले हनुमानजी और प्रेत राजा अरावली पर्वत पर प्रकट हुए थे। बुरी आत्माओं और काले जादू से पीड़ित रोगों से छुटकारा पाने लोग यहां आते हैं। इस मन्दिर को इन पीड़ाओं से मुक्ति का एकमात्र केंद्र माना जाता है। मंदिर के पंडित इन रोगोंं से मुक्ति के लिए कई उपचार बताते हैं। शनिवार और मंगलवार को यहां आने वाले भक्तों की संख्या लाखों में पहुच जाती है। कई गंभीर रोगियों को लोहे की जंजीर से बांधकर मंदिर में लाया जाता है। यहां आने वाले पीडित लोगों को देखकर सामान्य लोगों की रूह तक कांप जाती है। ये लोग मंदिर के सामने ऐसे चिल्ला-चिल्ला के अपने अंदर बैठी बुरी आत्माओं के बारे में बताते हैं, जिनके बारे में इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता है। भूत प्रेत ऊपरी बाधाओं से निवारणा पाने यहां लोग आते हैं ऐसे लोग यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर वापस लौटतें हैं
बादशाहों ने मूर्ति को नष्ट करने कि कोशिश की थी
कहा जाता है कि मुस्लिमों के शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने का किया था प्रयास हर बार ये बादशाह असफ़ल होते रहे। वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही लंबी और गहरी होती चली गई। थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास को त्याग करना पड़ा। ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया था । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें इस चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था। लेकिन ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन यह चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता। स्टेशन मास्टर असमंजस में पड़ गया और उस चोले को बिना लगेज ही जाने दिया उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया। इसके बाद बालाजी को नया चोला चढ़ाया गया।
प्रसाद ग्रहण करते ही झूमने लगते हैं पीड़ित लोग
प्रसाद का लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है। अजीब तरह कि हरकतें करने लगता है भूत प्रेत स्वयं ही उसके शरीर में आकर चिल्लाने लगते हैं। कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोटने लता है। पीड़ित लोग यहां पर अपने आप जो क्रियाएँ करते हैं वह एक सामान्य आदमी के लिए संभव नहीं है। इसलिए उन्हें बांध कर रखा जाता हैं इस तरह की प्रक्रियाओं के बाद वह हमेशा के लिए इस तरह की परेशानियों से मुक्त हो जाता है। बालाजी महाराज के मंदिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है।
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
कहा जाता है कि कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उन्हीं ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल , डमरू , खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पांचवां कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं पहनते बल्कि लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं। उनकी मूर्तियों पर तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है
इसलिए कहा जाता है कोतवाल कप्तान
कहा जाता है कि शास्त्र और लोक कथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं। श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। जिनकी भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं। भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा बहुत ही श्रद्धा से गाए जाते हैं। प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े , खीर का भोग और बूंदी का लड्डू चढ़ाया जाता है।सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूतप्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं , जो हमेशा उसके साथ रहता है

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